Braj Ras
Daily journal 18-nov
Braj Ras
आज सुबह पेपर में ब्रज रस का प्रोग्राम देखा। शाम 5 बजे से। अक्सर मैं ऑफिस से निकलने के बहाने ढूंढ़ता रहता था क्यूंकि ऑफिस में पूरा टाइम बिताना अपने आप में एक सजा थी। ऐसा सन्नाटेदार ऑफिस का मेरा पहला अनुभव था। Pin Drop साइलेंस। अपनी आवाज़ अपने आप को ही सुनती। काम ज्यादा नहीं था ऑफिस में। सब अपने earphones लगा कर बैठे रहते और समय के ख़तम होने का इंतज़ार करते रहते। मेरे जितना दम किसी में न था जो अपनी छुट्टी का बलिदान कर ऑफिस से निकल जाता था। पर मेरे को ऐसे FREE बैठना अच्छा नहीं लगता था। लगता था मानो कोई चीज़ कचोट रही हो अंदर से। भागने का मन करता था मेरा। कई बार ये जॉब छोड़ने की सोची पर हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। ड्रग्स है न - सैलरी। इस ड्रग का मैं आदि हो चुका था।
जब कुछ न बन पा रहा था तब मैंने ऐसे ही मज़े लेने की सोची। अक्सर मैं ऑफिस से जल्दी भाग जाता था। Yes. भागना ही सही शब्द है। अपने आपको भगाना पड़ता था इस atmosphere से। समय को इस्तेमाल करना सीख लिया था मैंने। हालाँकि पैसे कट जाते थे , पर इस अनुभव की फीस तो देनी पड़ेगी न।
इस "भागे" हुए समय का इस्तेमाल मैं किसी न किसी प्रोग्राम में जाकर करता था। बिलकुल भी टाइम वेस्ट नहीं। टाइम वेस्ट करना कभी भी मक़सद नहीं था। मुझे टाइम का सही इस्तेमाल करना था। टाइम वेस्ट करना होता तो ऑफिस से भागने की जरूरत ही नहीं थी, वहीँ अच्छा-खासा टाइम वेस्ट हो रहा था।
खैर, सुबह ब्रज रस का पढ़ने के बाद मन में एक अजीब सी ख़ुशी थी। शायद आज के भागने का अवसर मिल गया था। सबको बोल दिया, तैयार रहना 5 बजे तक। आते ही चलना है। वृन्दावन के नाच-गाने का प्रोग्राम लगता है, सो मिस नहीं करेंगे। मम्मी, गौरी, ऊर्जा तीनो राज़ी हो गए और मैं ख़ुशी-ख़ुशी ऑफिस चल पड़ा।
लगभग 4:30 बजे मैं ऑफिस से निकल पड़ा। 1 घंटे में घर पहुंचा और अगले 10 मिनट में हम सब इंद्रधनुष ऑडिटोरियम की तरफ निकल पड़े। गौरी ने साथ में खाने का भी सामान रख लिया , मानो अगर प्रोग्राम देखते-देखते भूख लग आये, तो इंतज़ाम है। अँधेरा होने लगा था। हम पहुँचने ही वाले थे। ऑडिटोरियम के पास हमे काफी लाइटिंग लगी हुई मिली और पास पहुँचते ही हमें श्री पुण्डरीक महाराज जी का "ब्रज रस" का बोर्ड दिखाई दिया। गौरी खुश हो गई। पुण्डरीक जी का प्रोग्राम। वाह।
प्रोग्राम की जो भूमिका हमने सोची थी, वह एकदम से चेंज हो गई। ऐसे पॉजिटिव वाइब्स आने लगे मानो हम कहाँ ही जा रहे हैं? भागवत कथा होगी, नाच-गाना होगा पता नहीं। हम ऑडी में पहुँच गए। पार्किंग में गाड़ी खड़ी करके निकले तो मैन एंट्रेंस पर कई छोटे पंडित थे जो "राधे" का टीका लगा रहे थे। हम सबने लगवा लिया। और जूते उतार कर हम अंदर पहुँच गए। अभी ऑडी लगभग खाली ही था। तो हम आगे वाली सीटों पर जा कर बैठ गए बिलकुल स्टेज के सेंटर में। महाराज जी अभी पधार ही रहे थे।
स्वागत सत्कार होने का बाद, जैसे ही प्रोग्राम शुरू हुआ, ऑडियो अपने पूरे जोश में चला तो ये मंत्रमुग्ध कर देने वाला था। पुण्डरीक जी को हम LIVE में दूसरी बार देख रहे थे। इससे पहले पिछले वर्ष "अग्रवाल भवन" में भागवत कथा में कुछ घंटे हम गए थे। तब से इनको सुनने का आनंद आने लगा था। एक विशेष शैली है इनकी कथा सुनाने की। बच्चे से लेकर बुज़ुर्ग तक भी आनंद लेते हैं इनकी कथा का। हंसी मज़ाक करंट अफेयर्स और दिनचर्या की बातों को ऐसे तरीके से कथा में बांधकर बताते हैं कि पता ही नहीं लगता कि हम कोई धार्मिक कार्यक्रम में आये हुए हैं। हिंदी, संस्कृत और सब्जेक्ट पर इनकी पकड़ इतनी ज़्यादा है कि सुनने वाले अभिभूत हो खो जाते हैं। भाव प्रवाह अपने आप ही हो जाता है। आप बोर महसूस नहीं करते। ऊपर से LIVE का आनंद तो अद्भुत ही होता है। वो तबले की थाप, दिल की धड़कनो से मैच करती हुई, सारंगी मानो ब्लड-फ्लो की तरह, हारमोनियम रोम-रोम में बस्ता हुआ और एक तेज़ संगीत के बाद, पिन-ड्राप साइलेंस आपकी आखों से एक कतरा कब गिर जाये, पता भी नहीं चलता।
पहली बार हमने शुरू से अंत तक महाराज जी का प्रोग्राम सुना। लगभग 4 घंटे अविरल भाव-भिवोर करने वाली प्रस्तुति अंतर्मन को इतनी शांति दे रही थी, मानो हम अपना सर्वस्व भूल कर वृन्दावन में ही बैठे हुए हैं। मेरी जेब में काजू और अखरोट थे, थोड़ा मुँह चलने के लिए। पर यकीन मानो मेरा जेब की तरफ हाथ ही नहीं गया। न भूख लगी, न प्यास। इसी अनुभव के लिए ऑफिस से छुट्टी का बलिदान सफल हो गया था। मैं बहुत रिलैक्स्ड फील कर रहा था। मम्मी, गौरी का चेहरा एक निश्चिंतता की छवि झलका रहा है। ऊर्जा परेशान थी, क्यूंकि उसकी समझ के परे की बातें थी, पर बीच-बीच में कहानियों पर वह भी हँस रही थी।
हम सब 4 घंटे वृन्दावन के उस मायाजाल में, कृष्ण, राधा, गोप, गोपियों के साथ ब्रज रज में लोटपोट हो रहे थे। महाराज जी ने ऐसा सचित्र वर्णन किया मानो वो आखों में वृन्दावन की फिल्म चल रही थी और सब एकटक देखते जा रहे थे।
रात 9:30 बजे हम ऑडी से बाहर निकले तो आयोजकों ने हमें खाने का न्योता भी दिया। शुद्ध सात्विक भोजन प्रसाद लेकर हम लगभग 11 बजे घर पहुंचे। बहुत सुकून की नींद आयी और प्रोग्राम की झलकियों के सपने भी आये। शायद जीवन में पहली बार ब्रज का रस इतना गहरा मन में पहुंचा था।
ये प्रोग्राम अभी 5 दिन चलना है, पर हम पर फिर कृपा होगी या नहीं, कह नहीं सकते। महाराज जी कहते हैं जिस पर कृपा होगी, उसे भगवान् अपने आप बुला लेंगे।
आभारी हैं, आशीर्वाद है हम पर कि हम इस आयोजन तक पहुँच पाए। कैसी विचित्र सी कहानी लगती है, पर मज़ा आ गया। जय श्री राधे।
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